सुदर्शन

हास्य व्यंग्य के विविध रंग

उलटे सीधे सर्वे…..

Posted by sudadmin on August 5, 2016

इस ब्लॉग के कुछ चुनिन्दा  और शुरुआती व्यंग्य लेखों तक पाठकों की नज़रें नहीं पहुँच रही है…उन्ही में से एक पेश-ए-खिदमत है.

 

उलटे सीधे सर्वे

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सावन में फैले सांवरिया

Posted by sudadmin on August 3, 2016

शहर का मौसम पिछले कई महीने से बड़ा बेइमान होता जा रहा है । इधर डेंगू, इनसेफलाइटिस, मलेरिया, फाइलेरिया की बीमारी पर काबू पाने के लिये डॉक्टर जी तोड़ प्रयास कर रहे हैं उधर सावन के महीने में शहर के पेड़ों पर झूला पड़े न पड़े पर वन साइडेड प्यार में गिरफ्तार शहर के मजनुओं को लावेरिया का फीवर बुरी तरह से त्रस्त किये हुये है ।

वैसे तो सावन का महीना ‘बोल बमका महीना होता है, शिवलिंग पर दूध और गंगाजल से अभिषेक का महीना होता है, पर साथ ही रिमझिम बरसात में बालीवुड फिल्में देख बौराई जवानी के फिसलने का भी महीना होता है । बरसात में सड़क पर भीगती आती जाती युवतियों को पेड़ के नीचे खड़े हो कर ताड़ने वाले पापी रोमियों के दर्शन आप भी कर सकते हैं आज कल । पुलिस के आला हाकिम भी इधर युवाओं में बढ़ती इस लवेरिया बीमारी की बढ़त देख कर हैरान हैं ।


दौलतपुर मोहल्ले में एक सिरफिरे आशिक ने प्रेमप्रपंच में अंधे हो कर अपने सगे चाचा के परिवार को एक रात निपटा दिया । चमनगंज इलाके में एक मजनू लवेरिया के प्रकोप से पीड़ित हो कर पड़ोसन शिक्षिका के घर में घुस गया । शिक्षिका ने विरोध किया तो श्रीमान मजनू, मजनू से गुलशन ग्रोवर बन गये और दिये दो रहपट प्रेम का पाठ न पढ़ने वाली शिक्षिका के गाल पर । शोर मचा तो अगल अगल की पब्लिक इकट्ठी हुयी और किसी तरह श्रीमान आशिक के पंजो से उस बेचारी टीचर को बचाया गया ।


मामला मोहल्ले का ही था इसलिये कुछ बुजुर्गवार श्रीमान आशिक को समझाने लगे, ’बेटा ये क्या हो रहा है ? हमारी जवानी में  तो पास पड़ोस की लड़कियों को बहन मान कर इज्जत दी जाती थी लेकिन आजकल के युवक पड़ोस की बहन बेटियों की इज्जत से खिलवाड़ करने पर अमादा हैं ।

बगल में खड़े हेड कांस्टेबिल ने मुस्कुरा कर कहा, ‘चाचा जी, आपके जमाने में स्मार्टफोन नहीं आया था । अगर आप आशिक महोदय का मोबाइल चेक करेंगे तो माजरा खुद ही समझ जायेंगे । इनके मोबाइल में विदेशी लड़कियों की सैंकड़ों नंगी फोटो और ब्लू फिल्में मिलेंगी । आशिकी में इनकी थीसिस तो पहले से ही तैयार है । बस प्रेक्टिकल नहीं कर पा रहे हैं । आज बोहनी करने जा रहे थे कि पुलिस बीच में आ गयी । अब इनकी बाकी की क्लास बड़े घर में लगेगी ।

animated-love-image-0594=> शीतल डियर ये बारिश होने वाली है या तुम्हारे पापा बालकनी से टार्च की रोशनी मार रहे हैं…..ज़रा पता करो….मैं जूते पहन लेता हूँ……पिछली बार तुम्हारे घर पर ही छूट गए थे.

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मौसम बड़ा बेइमान है

Posted by sudadmin on July 28, 2016

बरसात के मौसम पर लिखी एक पुरानी रचना याद आ गयी….आप भी इसका आनंद उठायें.

 

मौसम बड़ा बेइमान है

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कदम कदम मिलाये जा…..

Posted by sudadmin on July 21, 2016

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जनकीगंज स्टेशन से ट्रेन छूटते ही दो उच्चकी महिलाओं ने एक महिला यात्री का हैंडबैग झपटकर गेट के पास खड़ी दो महिलाओं ककी तरफ फेेंका । गेट पर खड़ी छिनैत महिलाओं ने महेन्द्र सिंह धोनी की तरह लपक कर कैच पकड़ा और चलती गड़ी से कूद गयीं । पर बैग छीनने वाली दोनों महिलाएं खुश्किस्मत नहीं थीं, उन्हें मुसाफिरों ने कड़ी फील्डिंग करके दबोच लिया । पकड़ी गयी महिलाओं की निशानदेही पर बैग लेकर रफूच्चकर होने वाली महिलाओं को भी तुरंत स्टेशन के पास से ही धर दबोचा गया । स्टेशन पर चारों छिनैत महिलाओं को देखने के लिये भारी भाड़ी इकट्ठी हो गयी ।

 

पुलिस इंस्पेक्टर ने छिनैती की शिकार महिला मुसाफिर का बैग देकर कहा, ‘सारा सामान चेक कर लीजिये ।’

महिला मुसाफिर ने सारा सामान सहेजने के बाद कहा, ’जेवर और कागज तो मौजूद हैं, लेकिन नकदी में सौलह सौ रूपये कम हैं ।’

पास खड़ा जीआरपी कांस्टेबल मुस्कुराया, ’रूपये को भूल जाइये । चार लुटेरी औरतों ने इतनी मेहनत की है तो उन्हें भी कुछ मिलना चहिए ।’

इस पर बगल में खड़े एक मुसाफिर ने कहा, ‘उच्चकी महिलाओं के साथ पुलिस ने इतनी भागदौड़ की है तो उसे भी तो सांत्वना पुरूस्कार की चाह रहती है । पुलिस ट्रेन में मुस्तैद रहे तो कोई औरत ऐसी दुस्साहसिक वारदात कर ही नहीं सकती ।’

युवक के पास खड़ा एक अधेड़ हंस पड़ा, ’इस छिनैती से साबित हो गया कि हमारे देश में औरतें मर्दों से  किसी बात में कम नहीं हैं । वे मर्दों के बराबर कदम से कदम मिला कर चल रहीं हैं ।’

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जनसंख्या वृद्धि दिवस का कर्मकांड

Posted by sudadmin on July 12, 2016

विश्व जनसंख्या दिवस के उपलक्ष्य में जिला सरकारी चिकित्सालय के सभागर में आयोजित संगोष्ठी कई मायने में काफी दिलचस्प रही । आडिटोरियम में जनसंख्या विस्फोट से चिन्तित लोगों की संख्या उंगली पर गिनी जा सकती थी । लगभग पच्चीस पुरूषों के मुकाबले पैंतालीस महिलाएं संगोष्ठी की शोभा बढ़ा रही थीं । जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी  अपने ही दफ्तर में स्टॉफ के घेराव से त्रस्त होकर गोष्ठी में शिरकत नहीं कर सके ।

इस आयोजन का सारा कर्मकाण्ड हर साल की तरह परम्परागत तरीके से पूरा किया गया । मौके पर मौजूद लोगों की संख्या कम थी, इसलिये ठंडी बोतलों का दौर कई बार चला । आयोजन का कवरेज करने आये एक रिपोर्टर ने  बगल में बैठे डाक्टर से से कहा, ‘जनसंख्या कम होने का एक फायदा तो साफ नजर आ रहा है । अगर इस आयोजन में सारे आमंत्रित शामिल होते तो आपको चौथी बार ठंडी बोतल पीने का मौका नहीं मिलता ।’

डाक्टर छूटते ही बोला, ‘जी हॉं, इस मीटिंग में महिलाओं की संख्या पुरुषों  से ज्यादा है । क्या इससे साबित नहीं होता कि महिलाओं को बढ़ती आबादी की फिक्र ज्यादा है ।’

पत्रकार ने पलटवार किया, ‘डाक्टर साहब, एक सलाह देना चाहूॅंगा । इस मौके पर हर साल मीटिंग करने की जरूरत नहीं है । आप एक साल भाषण देने वालों की अच्छी अच्छी बातें रिकॉर्ड कर लीजिए और उसे हर साल सुनाते रहिये । काम आसान हो जायेगा ।’

दूसरा पत्रकार जोर से हंस पड़ा, ’सुझाव तो अच्छा है । लेकिन हर साल फिर ठंडा पीने का मौका कैसे मिलेगा ।’

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=>एक को चुप कराओ तो दूसरा रोने लगता है…..सोचिये देश की कितनी ऊर्जा इन्हें चुप कराने में ही खर्च हो जाती होगी….

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मुंशी इतवारीलाल और बांझ बहू

Posted by sudadmin on July 10, 2016

lady women girl fairy (4)बाबूलाल : (बड़बड़ाते हुये) एक हजार एक सौ मरतबा समझा चुका हूँ, पर वाह रे तिरिया ! कान पर जूं नहीं रेंगती ।

सतीश : (आवाज लगाकर) क्या बात है बाबूलालजी, सुबह सुबह लालटेन हो रहे हो ! बैठक में आओगे या अंदर ही भाषण देते रहोगे ।

बाबूलाल :(पास आते हुये) आया सतीश बाबू ! भाषण नहीं दे रहा हूँ  । अपने कर्म को रो रहा हूँ  । मगर इस घर में मेरी कोयी सुने, तब न । बताइये, एक हजार एक सौ एक मरतबा कोई बात कहूँ  तो उसका असर क्यों नहीं होता ।

सतीश : वाकई यह ताज्जुब की बात है ! हजार बार कहने से तो मंत्र से भी  सिद्ध हो जाता है ।

बाबूलाल : आप ही देखिये न सतीश बाबू ! मैंने हजार बार अपनी बहू से कह दिया कि सुबह सुबह जब मैं तिजोरी खोलकर लक्ष्मीमैया के दर्शन करता हूँ,  उस वक्त मेरे सामने न पड़ा करे । पर वह है कि ‘बाबूजी चाय’ कह कर छिपकली की तरह सामने कूद पड़ती है । कसम भगवान की, इतना गुस्सा आता है कि मेरे माथे में चाय की केतली उबलने लगती है ।

सतीश : कमाल है जनाब ! कोयी सुबह सुबह चाय न मिलने पर गुस्साता है और आप चाय देखकर भड़कते हैं ।

बाबूलाल : हॉं मैं भड़कता हॅूं । मुझे तिजोरी खोलते वक्त बहू का आना कतई पसंद नहीं ।

सतीश : क्यों क्या वह तिजोरी पर हाथ साफ कर देती है ।

बाबूलाल :  नहीं जी ! आप तो जानते हैं,  साल के साल गुजरते जा रहे हैं,  पर उसकी कोख फलने का नाम नहीं लेती । घरवाली कहती है कि वह बॉंझ है । मुहल्लेवाले उसकी छांव बरकाने लगे हैं । ऐसा अशुभ चेहरा देखने को क्या मैं ही बचा हूँ  ।

सतीश : अच्छा तो यह बात है । मैंने तो सोचा था कि शायद लड़के-बहू में बनती नहीं है ।

बाबूलाल : बनती क्यों नहीं । अरे सतीश भैया, बनती तो ऐसी है कि गुड़ और चींटा मात खा जाये । पर भैया, ऊसर में कहीं दूब जमती है । मेरी ऑंखे तरस गईं चांद से पोते का मुंह देखने के लिये । वह दिन आता तो मैं क्या नहीं करता । (लम्बी सांस भरकर) पर किस्मत को क्या कहूँ  ।

सतीश : (जोश में) आप भी बाबूलाल जी, मर्द हो कर किस्मत का रोना रोते हैं । जो किस्मत पर काबू न पाये, वह भी कोयी इंसान है ।  बहू बांझ निकल गयी तो उसका क्या रोना । हुमक कर लड़के की दूसरी शादी कर डालिये । देखिये, एक लड़की मेरी निगाह में है ।

बाबूलाल : यही तो रोना है सतीश बाबू ! लड़के पर अपना काबू जो नहींहैं । वह दूसरी शादी की बात सुनकर ऐसा मौनी बाबा बन जाता है गोया मुंह में जबान ही न  हो ।

सतीश : वाह बाबूलाजली ! आप क्या लड़के को बेशर्म समझते हैं, जो वह आपके सिर चढ़कर हामी भरे । आप शादी का डौल तो बैठाइये ।

बाबूलाल : क्या डौल बैठाऊॅं ! ऐसे में कौन भला आदमी ऑंख मूंदकर लड़की देगा । पड़ोसी हैं,  समाज है और सबसे ऊपर मुंशी इतवारी लाल की लताड़ का डर है ।

सतीश : देखिए बाबूलालजी, समाज और मुंशी इतवारीलाल को तो अपने अंगूठे पर रखिये । रही लड़की की बात, सो मेरी निगाह में आपकी बिरादरी की ही एक लड़की है । रूप-गुण में लक्ष्मी है, पर हॉं, जरा गरीब है ।

बाबूलाल : (उत्सुकता से) ऐसा । तो फिर देर क्या है सतीश बाबू ! नेकी और पूछ पूछ । आप बात क्यों नहीं चलाते ।

सतीश : बात तो पक्की ही समझिये । बस, आप एक बार चलकर लड़की देख लीजिये । लड़की क्या है, कच्चे दूध का कटोरा समझिये ।

बाबूलाल : तो चलिये, आज ही चलता हूँ ।

सतीश : चलिए, पर एक बात समझ लीजिये । लड़की गरीब घर की है, इसलिये कुछ मिलने का डौल नहीं है ।

बाबूलाल : आप मुझे क्या पैसा का लालची समझते हैं ।

सतीश : नहीं, मैं आपको साधु समझता हूँ । पर सारी बात पहले ही साफ कर लेना अच्छा रहता है । और हॉं, अच्छी बहू के लिये अगर आपके कुछ रूपये खर्च हो जायें, मेरा मतलब है – गरीब लड़की वाले की कुछ मदद करनी पड़े तो आप तैयार हैं ।

बाबूलाल : (आश्चर्य से) जी…….ई……ई……. आप चाहेंगे तो वह भी करूंगा ।

सतीश : (अकड़ कर) मैं कुछ नहीं चाहता । मैं तो सिर्फ दोस्तों की मदद और खिदमत करना चाहता हूँ  । पर होम करते हाथ जलते हैं, इसलिये सारी बात दो टूक कह दी । नहीं तो बाद में आप मुंशीजी के सामने रोना रोने लगें ।

बाबूलाल : मुंशीजी को छोड़िये सतीश बाबू ! वो तो हमेश लेक्चर झाड़ते रहते हैं । सातवें आसमान से बातें करते हैं । उन्हें कभी कभी आदमी की कसक नहीं सालती । मैं इस बारे में उन्हें बताना भी नहीं चाहता ।

                                           दृश्यांतर

पंडितजी : मुंशीजी कुछ भी कहें बाबूलाल, पर तुम्हारी बात में दम हैं । शास्त्र में भी लिखा है कि स्त्री बन्ध्या हो तो पुरूष को दूसरा विवाह कर सकता है ।

बाबूलाल : आप धरम की बात कहते हैं पंडितजी, पर यही बात मुंशीजी को क्यों नहीं समझाते । वे तो मुहल्ले में मेरा उठना बैठना मुश्किल किये हुए हैं ।

पंडितजी : मुंशीजी दीख पड़ें तब न । मैं क्या दीवारों को समझाऊॅं ।

मुंशीजी : (दूर से) दीवारों को मत समझाइए पंडितजी ! बाबू बाबूलाल जी तो आपके पास ही मौजूद हैं । उन्हें कथा सुनाइए । ये आपको दच्छिना  देंगे भगवान के फजल से ।

पंडितजी : (हंस कर) बाबूलाल को तो सुना ही रहा हूँ  मुंशीजी । आप भी आकर बैठ जाइए तो प्रसादी मिल जायेगी ।

मुंशीजी : यह परसादी बिरहमन देवता को ही मुबारक  हो ।  मुझे इस कुफ्र के धन्धे में हाथ नहीं डालना है । बाबू बाबूलालजी की अक्ल तो घास चरने गई है ।

पंडितजी : बेचारे बाबूलाल पर आप व्यर्थ नाराज हो रहे हैं । इन्हें तो अपने वंश के लोप होने का खतरा सता रहा है ।

मुंशीजी : (आवेश से) अभी तो बाबू बाबूलालजी के लड़के की शादी हुए जुमा जुमा आठ दिन हुए हैं । दोनों अभी अल्हड़ हैं । दोनों के हंसने खेलने के दिन हैं । पर आप लोग हैं कि बच्चों की हल्की फुल्की जिंदगी पर खामखॉं बोझ डालने पर तुले हैं ।

बाबूलाल : तो क्या मैं पोते का मुंह देखे बिना ही मरूंगा मुंशीजी ।

मुंशीजी : आप अभी नहीं मरेंगे क्योंकि आप हट्टे कट्टे मुस्टंडे हैं । हॉं, आप बेटे और बहू को बेमौत जरूर मारेंगे । मैं पूछता हूँ  लड़का लड़की होने के बारे में मियॉं बीबी नहीं सोचते तो आप क्यों बीच में टांग अड़ाते हैं । ये निहायत निजी मामले हैं भगवान के फजल से ।

बाबूलाल : लड़का नादान है, वह कुछ नहीं समझता । बहू बांझ है, पर लड़का उसके रूप पर लट्टू है ।

मुंशीजी : मैं आपकी यह बाकवास तब तक नहीं मानूँगा, जब तक आपके लड़के से बात नहीं कर लूँ ।

सतीश : लड़के की मर्जी ही सब कुछ हो गयी । बाप की मर्जी कुछ नहीं । क्यों मुंशीजी ।

मुंशीजी : नहीं, बाप की मर्जी खुदाई फरमान है सतीश बाबू ! आप यह शादी करवा दीजिये । पर लड़के ने नहीं चाहा तो बाबू बाबूलालजी को पोता कैसे खिलाने को मिलेगा । उस वक्त आप ही गोपाल कन्हैया बनकर बाबू बाबूलालजी की गोद में उछल जाइयेगा ।

सतीश : देखिये, आप मेरा नम बिल्कुल मत लीजिए । मैं यों भी बहुत बदनाम हो चुका हूँ । मेरा इन बातों से कोई वास्ता नहीं ।

मुंशीजी : मुझे मत चराइए सतीश बाबू, बंदा उड़ते परिंदे की जात पहचानता है । आप हरफनमौला हैं । आप लोहे में भी हैं और लुहार में भी ।

सतीश : (गुस्से से) देखिये मुंशीजी, आप मुझे बदनाम करने पर तुले हें तो लीजिए मैं ही शादी करवा रहा हूँ । आप क्या कर लेंगे ।

मुंशीजी : आप मुंशी इतवारीलाल वल्द बुधवारीलाल मीरबख्शी को चुनौती दे रहे हैं तो कान खोलकर सुन लीजिए – मैं यह शादी किसी कीमत पर नहीं होने दूंगा भगवान के फजल से ।

                                             दृश्यांतर

पंडितजी : (रूआंसे स्वर में) बाबूलाल गजब हो गया, मैं तो कहीं का न रह गया ।

बाबूलाल : (घबराये स्वर में) क्या  हुआ पंडितजी ! जल्दी बताइए, मेरा जी धक धक करता है ।

पंडितजी : अरे वो समधीजी महीनों पहले बिटिया को घर पहुंचा गये थे । मैं उस वक्त कुछ न समझा कि क्या बात है । लड़की ने भी कुछ नहीं बताया । आज समधीजी की चिट्ठी आयी है । वे लिखते हैं कि अपने लड़के की दूसरी शादी करने जा रहे हैं ।

सतीश : शादी करने जा रहे हैं, क्यों ।

पंडितजी : लिखते हैं मेरी लड़की बांझ हैं, उनका वंश डूब जाने का खतरा है । उन्होंने बरसों इंतजार किया, अब लड़के की दूसरी शादी करेंगे । तिलक भी चढ़ गया है ।

बाबूलाल : यह तो सरासर जुर्म हैं पंडितजी । हम यह अन्याय सहन नहीं करेंगे ।

पंडितजी:  मेरी मदद करो बाबूलाल, वर्ना मैं गरीब आदमी तो बेमौत मर जाऊॅंगा । तुम इसी वक्त मेरे साथ चलो । हमें यह विवाह रोकना ही पड़ेगा ।

बाबूलाल : इस वक्त ! पर इस वक्त तो मैं जरूरी काम में फंसा हूँ  । लड़कीवाले मेरे लड़के को देखने आ रहे हैं । सतीश बाबू ने सारा इंतजाम किया है ।

पंडितजी : लड़कीवालों को सतीशबाबू बैठा लेंगे । इस वक्त तो तुम्हें चलना ही पड़ेगा वर्ना, मैं कुएं में कूद कर जान दे दूंगा ।

बाबूलाल : ऐसा मत कहिए, मैं अभी चलता हूँ । पर मुझसे यह सब कैसे होगा । यह काम तो मुंशीजी के ही बस का है ।

पंडितजी : मुंशीजी तो उसी दिन से ऐंठे हुए हैं । उन्हीं के पास चलो । तुम्ही उनको समझाओ । मेरा तो दिमाग चकरा रहा है ।

बाबूलाल : अच्छा चलिए । सतीश बाबू ! आप तब तक लड़कीवालों को सम्हालिएगा ।

सतीश : सम्हाललूंगा । पर आप जल्दी आइएगा ।

                          दृश्यांतर

पंडितजी : आप समधीजी को खूब समझा दीजिएगा मुंशीजी !  मैं सुदामा ब्राह्यण नहीं परशुराम हूँ  । मेरे सोंटे ने बहुत तेल पी रखा है । मैंने समधीजी का पैर पूजा है, सिर नहीं पूजा, हॉं ।

मुंशीजी : यह तो हुई धमकी । पर समधीजी भी अगर आपकी तरह शास्तर समझाने लगे, बांझ की दलील पर शादी की हिमायत में इश्लोक बोलने लगे तो मैं क्या जवाब दूंगा । यह भी समझा दीजिए भगवान के फजल से ।

बाबूलाल : शास्त्र-धरम को ताक पर रखदीजिए मुंशीजी ! हम लोग कोई घास फूस नहीं । जो समधीजी इस तरह से हमारी लड़की छोड़ देंगे । पंडितजी ने शादी की है, कोई खिलवाड़ थोड़े ही किया है ।

मुंशीजी : यह आप कह रहे हैं बाबू बाबूलालजी । पंडितजी आपके दोस्त हैं, संगी हैं, इसलिए उनकी लड़की का दर्द आपका अपना दर्द है । पर आप भूल गये कि आप जिस बहू को ब्याह कर लाये हैं, उसके भी एक बाप है और उस बाप के दिल में भी अपनी बेटी के लिये दर्द है ।

बाबूलाल : (हकलाकर) पर……..मैं………..मेरी बहू बांझ है मुंशीजी ! सच ।

मुंशीजी : बांझ तो पंडितजी की बेटी भी हो सकती है । पर इसका जवाब मैं फिर दूंगा  । अभी तो समधीजी से मिलना जरूरी है भगवान के फजल से ।

                                       दृश्यांतर

समधीजी : मैं आपका अनुरोध टाल नहीं सकता मुंशीजी ! आप सज्जन पुरूष हैं । पर मैं अपना फैसला नहीं बदल सकता । मैंने तिलक ले लिया है और लड़के की शादी करके रहूंगा ।

पंडितजी : आप यह शादी करेंगे तो प्रलय मच जायेगा समधीजी ।

बाबूलाल : हमारी लड़की के आंसू गिरे तो हम खून गिरा देंगे ।

समधीजी : आप लोग मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते । मैं जाता हूँ  ।

मुंशीजी : अरे, अरे, अभी तशरीफ लाये । अभी रौनक अफरोज हुए और अभी चल दिये । यह कैसे हो सकता है समधीजी ! मुंशी इतवारीलाल मीरबख्शी के बैठक से हुजूर नाराज हो कर जायेंगे तो गुलाम क्या मुंह दिखायेगा भगवान के फजल से ।

समधीजी : तो आप इन लोगों को समझा दीजिए कि मेरे मुंह न लगें ।

मुंशीजी : मुंह तो ये जरूर लगेंगे समधीजी ! हमारा आपका रिश्ता ही ऐसा है । हमारी लड़की आपकी बहू है । उसे दुःख होगा तो हम -आप दोनों दुखी होंगे ।

समधीजी : तो गोया आप चाहते हैं कि मैं बांझ को घर बैठाये रहूँ  और घर का दीपक बुझ जाने दूँ ।

मुंशीजी : बांझ कौन है – जरा हम भी तो सुनें भगवान के फजल से ।

समधीजी : मेरी बहू बांझ है ।

मुंशीजी : और अगर मैं यह अर्ज करूं कि वह बांझ नहीं है तो ।

समधीजी : बांझ नहीं है तो उसके संतान क्यों नहीं हो रही है ।

मुंशीजी : हॉं, यह सवाल मौजूं है और इसका जवाब आपके लड़के यानी हमारे दामाद ने इस खत में दिया है । इसे पढ़ लीजिए । इसमें बरखुरदार साफ लिखते हैं कि उनकी बीबी यानी हमारी लड़की और आपकी बहू में कोई खराबी नहीं । वह सब तरह से ठीक है, पर चूंकि बरखुरदार को अभी नौकरी नहीं मिली है और वे अपने बाप यानी हुजूर, समधी साहब पर बोझ नहीं बढ़ाना चाहते, इसलिये उनके लड़के नहीं होते ।

समधीजी : (परेशान होकर) पर ये कैसे हो सकता है । उसके चाहने से लड़के कैसे रूक सकते हैं ।

मुंशीजी : इंसान की अक्ल और साइंस के करिश्मे से सब कुछ हो सकता है समधीजी ! आप गुजरे जमाने के आदमी हैं । आपको क्या खबर कि आपका लड़का और आपकी बहू परिवार नियोजन का सहारा लेते हैं ।

समधीजी : तो यह बात है ! पर यह तो नासमझी का काम हुआ। परिवार नियोजन उसे करना चाहिए, जिसके चार-पांच बच्चों का परिवार हो । यहॉं तो परिवार ही डूबने को हो रहा है और ये लोग हैं कि………

मुंशीजी : यही तो मुश्किल है समधीजी ! परिवार नियोजन का मतलब ज्यादा बच्चों की रोकथाम नहीं । अपनी मर्जी और जरूरत के मुताबिक परिवार बनाना है । इस मामले में हमारे बच्चे ज्यादा दूरंदेश और समझदार हैं । बेहतर है हम नयी पीढ़ी के मामले में हाथ न डालें और बांझ या अशुभ का सदियों पुराना ढिंढोरा पीटना बंद कर दें । यह ढोल अब बहुत बेसुरा हो चुका है ।

बाबूलाल : अब तो आपको विश्वास हुआ समधीजी कि हमारी लड़की बांझ नहीं है ।

मुंशीजी : समधीजी  को तो यकीन हो गया बाबूलालजी, पर अभी आपको यकीन होना बाकी है ।

बाबूलाल : मुझको ।

मुंशीजी : जी हॉं, आपको ।  चूंकि आपकी अक्ल की भैंस अभी तबेले पर नहीं पहुंची है, इसलिये आप भी कान खोल कर सुन लीजिए ! आपकी बहू भी बांझ नहीं है । आपका लड़का भी वही कर रहा है, जो हमारा दामाद कर रहा है भगवान के फजल से ।

बाबूलाल : ओह ! तो यह बात है !

मुंशीजी : जनाब, यही बात है । इसलिए आपने सतीश बाबू को लड़की खरीदने के लिए जितना रूपया  दिया हो, उसे वापस ले लीजिए भगवान के फजल से ।

बाबूलाल : म….म…मैंने…..रू…रू….रूपये ।

मुंशीजी : आपने रूपये भी दिये थे और जेवर भी दिये थे । जेवर तो आपके लड़के ने वापस लाकर मेरे पास जमा कर दिये हैं । पर नकदी वसूलना आपका काम है ।

बाबूलाल : मैं अभी जाता हूँ  । सतीश अभी घर पर ही होगा ।

मुंशीजी : फौरन जाइए, और उससे लड़कीवालों का रूपया भी वसूल लीजिएगा । क्योंकि उसने लड़की की गरीब मॉं से भी पैसा ठग लिया है भगवान के फजल से ।

                                               समाप्त

लेखक : श्री नरेश मिश्र

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चेला चीनी हो गया….

Posted by sudadmin on July 4, 2016

हजारों रूपये महीने फीस लूट कर छात्रों को दिन दोपहर लूटने वाले शहर के एक कोचिंग संस्थान को तब अचरज हुआ, जब उसमें दाखिला लेने वाला प्र्रतियोगी परीक्षार्थी इम्तिहान में पास हो गया । पास होने वाले छात्र ने इस कोचिंग संस्थान में दाखिला लेकर 25 हजार रूपये गंवाये थे । दो महीने बाद उसने संस्थान छोड़ दिया था अपने बलबूते पढ़ने लगा गया था।

 

कोचिंग संस्थान के निदेशक उसके घर पहुंचे । उन्होंने प्रतियोगी को बधाई देते हुए कहा, ’आप हमारे संस्थान के छात्र रहे हैं । आप हमें अपनी एक फोटो और इंटरव्यू देने का कष्ट करें ।’

प्रतियोगी मुस्कुराया, ’मुझे कोई एतराज नहीं है । आपको फोटो और इंटरव्यू का 75 हजार रूपया देना पड़ेगा ।’

निदेशक चौंक गये, ’मैं आपको पैसे क्यों दूॅं ? मैं तो आपका प्रचार कर रहा हूँ ।’

प्रतियोगी छूटते ही बोला, ’प्रचार तो आप अपनी कोचिंग का करेंगे । मेरी फोटो छाप कर लाखोें बनायेंगे । मैं आपसे ज्यादा नहीं मांग रहा हूँ । आपने 25 हजार लेकर मुझे निराश किया था, मैं 75 हजार लेकर आपको मालामाल करूंगा ।’

सौदा नहीं पटा और निदेशक मायूस हो कर लौट गये । गुरू गुड़ ही रहे चेला चीनी हो गया ।

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=> ये फार्मूला घोंट के पी जाओ बरखुरदार……..पिछले ४ बार से  पी. सी .एस. में पूछा जा रहा है. तुम भी जल्द कलक्टर हो जाओगे…

 

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इज्ज़त की लड़ाई

Posted by sudadmin on July 1, 2016

इस शहर में आल्हा गाने की परंपरा अब दम तोड़ चुकी है । बीती सदी में झमाझम पानी बरसता था तो जवान लोग कड़कदार आवाज में आल्हा गा कर सुनने वालों में जोश भर देते थे । इस साल सूखे असाढ़ में भी आल्हा की परंपरा दिलचस्प तरीके से दोहरायी गयी ।

चमनगंज और दमपुरा के बीच तारापुरा मैदान में बिगड़ैल बांकों के दो दल बाकायदा चुनौती देकर आमने सामने हो गये । दोनों के बीच जबर्दस्त फायरिंग शुरू हो गयी तो आसपास की बस्ती में भगदड़ मच गयी ।

गोलीबारी की खबर पाकर पुलिस बल के साथ दरोगा मौके पर पहुंच गया । पुलिस को देख गुण्डों के हमलावर दस्ते घटनास्थल से भाग खड़े हुये । दरोगा ने दो बदमाशों को चहेट कर पकड़ लिया । उसने एक बदमाश को जोरदार तमाचा जमा कर पूछा, ‘क्यों बे, तेरी यह हिम्मत । दिन दहाड़े गोली चलाने में तुझे डर नहीं लगा ।’

बदमाश ने बेबाक जवाब दिया, ‘सरकार दुश्मनों ने मोबाईल पर मेसेज भेज कर हमें इस मैदान में लड़ने के लिये ललकारा था । हम इस चुनौती पर घर में चूड़ियॉं पहन कर तो नहीं बैठ सकते ।’

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=> बरखा रानी…..जरा जम के बरसो……मेरा दिलबर ..जा न पाए…. झूम कर बरसो…………….देखा आपने. मैं भी राग मल्हार गा सकता हूँ….बस एक अदद दिलबर की कमी है.

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“रानी नागफनी की कहानी” :- मेरी प्रिय किताबें

Posted by sudadmin on June 22, 2016

81-7055-199-4“रानी नागफनी की कहानी” हरिशंकर परसाई जी का छोटा सा व्यंग्य उपन्यास है । परसाई जी को हास्य व्यंग्य की दुनिया का ‘सम्राट’ कहा जाता है । व्यंग्य हास्य से भिन्न होता है । दोनों में बाल बराबर का फर्क होता है पर इस फर्क को समझ पाना बहुतों के लिये मुश्किल होता है । हास्य-व्यंग्य की परंपरा भारतीय साहित्य और विदेशी साहित्य में बहुत पुरानी है । भारतीय साहित्य में हास्य व्यंग्य की परंपरा या इतिहास की जानकारी लेने के लिये आप हमारा एक दूसरा लेख पढ़ सकते हैं ।

भारतीय संस्कृति में हास्य वंयग्य की जड़ें

आजादी के बाद के व्यंगकारों की पीढ़ी में हरिशंकर परसाई जी का नाम सबसे ऊपर आता है । उन्हें हम व्यंग सम्राट के नाम से जानते हैं । उनके तमाम लेख कोर्स में चलते हैं । इंटरमीडियट के पाठ्यक्रम में मैंने उनका लेख ‘निंदारस’ पढ़ा था । वहीं से मेरा उनसे परिचय हुआ और वो मेरी हिटलस्ट में आ गये । हिंदी साहित्य की किताबें मिलने की खास जगहें होती हैं । अगर आपको किसी खास लेखक की अमुक किताब पढ़नी है तब आपको उसे पढ़ने के लिये शहर की खास दुकान तक जाना पड़ेगा और खरीदना भी पड़ेगा । ये किताबें आपको आस पड़ोस में नहीं मिलेगी । उन दिनों मैं सिर्फ हास्य व्यंग्य की किताबें ही पढ़ा करता था और चुनिंदा लेखकों को ही पढ़ता था । फिर जिनको पढ़ता था उनकी बाजार में उपलब्ध सारी किताबें मैं  धीरे धीरे खरीद लेता था । इस तरह मेरी अलमारी में चुनिंदा लेखकों की लगभग सारी किताबें मिलेंगी । बंधे बंधाये जेब खर्च को किताबों पर खर्च करने के लिये एक दीवानापन चाहिये और वह दीवानापन मुझमें आज से 22-23 साल पहले जितना था वो आज भी कायम है ।

 

हरिशंकर परसाइ जी का जन्म 22 अगस्त 1924 को जमानी (इटारसी के पास) मध्य प्रदेश में हुआ था और निधन 10 अगस्त 1995 को हुआ था । वे पूरे जीवन किसी के नौकर न हुये बल्कि स्वतंत्र लेखन को ही अपने जीवनयापन का जरिया बनाया । उनकी प्रसिद्ध व्यंग पुस्तकें हैं: हॅंसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे (कहानी संग्रह), रानी नागफनी की कहानी और तट की खोज (उपन्यास), तब की बात और थी, भूत के पॉंव पीछे, बेईमानी की परत, वैष्णव की फिसलन, पगडंडियों का जमाना, शिकायत मुझे भी है, सदाचार का ताबीज, विकलांग श्रद्धा का दौर, (व्यंग निबंध संग्रह), हम एक उम्र से वाकिफ हैं, जाने पहचाने लोग (संस्मरण), परसाई रचनावली (समग्र साहित्य) ।

 

परसाई जी ने जबलपुर से एक साहित्यिक पत्रिका ‘वसुधा’ भी निकाली थी । उपरोक्त पुस्तकों के अलावा उन्होंने तमाम पत्र पत्रिकाओं में व्यंग कॉलम भी लिखे जो जनमानस में काफी लोकप्रिय हुये । उनके प्रसिद्ध कॉलम थे: ‘नई दुनिया’ में ‘सुनो भई साधो’ । ‘नई कहानियॉं’ में ’पॉंचवॉं कॉलम’ और ’उलझी-उलझी’ । ’कल्पना’ में ’और अंत में’ । ’सारिका’ के लिये ’तुलसीदास चंदन घिसे’ और ’कबिरा खड़ा बाजार में’ ।

 

परसाई जी का पूरा साहित्य व्यंग्य से भरा हुआ है पर जब आप उनका उपन्यास ”रानी नागफनी की कहानी“ पढ़ेंगे तो पायेंगे की यह हास्य से भी भरपूर है । यह उपन्यास आधारित है राजकुमार अस्तभान और राजकुमारी नागफनी की प्रेम कहानी पर । इसकी शुरूआत होती है ’भेड़ाघाट’ से जो कि जबलपुर में नमर्दा नदी पर स्थित संगमरमर का 400 फिट ऊॅंचा एक जलप्रपात है । लेखक के अनुसार उस जमाने में असफल प्रेमीजन, परीक्षा में फेल हुये विद्यार्थी और बेकारी से त्रस्त युवाजन भेड़ाघाट पर जाकर आत्महत्या किया करते थे । तत्कालीन सरकार ने वहॉं बाकायदा एक आत्महत्या विभाग बना रखा था जो ऐसे लोगों को पूरी सहायता देता था । लगातार पांचवे प्रेम में असफल राजकुमारी नागफनी और लगातार तीसरी बार बी. ए. की परीक्षा में फेल हुए राजकुमार अस्तभान दोनों की निगाहें भेड़ाघाट के घाट पर लड़ जाती हैं और यहॉं से उनकी प्रेम कहानी शुरू होती है, जिसमें तमाम दुश्वारियॉं उनके सामने खड़ी हो जाती हैं ।

 

परसाई जी ने इस प्रेम कहानी के समानांतर समाज और सरकार में फैले भ्रष्टाचार पर भी व्यंग्य किया है । जैसे जेल से छूटा दुर्दांत डाकू बाद में प्रसिद्ध महात्मा का वेश धारण कर समाज को बड़े स्तर पर छलता है । शिक्षा व्यवस्था और सरकारी नौकरी के इम्तिहानों में व्याप्त भाई भतीजावाद पर परसाई जी का व्यंग हंसाता कम है और मायूस अधिक करता है । आधुनिक काव्य और मॉर्डन आर्ट पर भी परसाई जी व्यंग का नश्तर चला देते हैं । प्रेम विवाह में दहेज वसूलने वाले चतुर सुजानों पर भी परसाई जी ने व्यंगबाण चलाये हैं । राजा जब प्रजा की मुसीबतों को कम नहीं कर पाता तो राष्ट्रधर्म के नाम पर पड़ोसी राज्य से युद्ध छेड़ देता है और प्रजा युद्ध में शामिल हो कर अपने दुख दर्द भूल जाती है । राजनीति में स्वार्थ ही परमार्थ है इसकी भी झांकी आपको इस प्रेम कहानी में मिलती है ।

 

इस छोटे से व्यंग उपन्यास की एक विशेषता यह भी है कि परसाई जी के साहित्य में आपको पहली बार हास्य मिश्रित व्यंग के दर्शन होंगे । परसाई जी का 95 प्रतिशत व्यंग साहित्य (जिन किताबों का मैंने ऊपर जिक्र किया है) उस समय के समाज, राजनीति, साहित्य, आर्थिक स्थितयों पर किया गया भयानक और तेजाबी व्यंग है । उनके व्यंग की धार किसी सर्जन के चाकू से भी अधिक तेज है । परसाई जी के बेबाक और धारदार व्यंग की वजह से जहॉं उनके ढेरो प्रशंसक थे तो उनसे शत्रुता रखने वाले भी कम नहीं थे और शायद इसी वजह से परसाई जी पर हमले भी होते रहते थे ।

 

“रानी नागफनी की कहानी” एक मजेदार व्यंग उपन्यास है । इसका रसास्वादन करने के लिये इस उपन्यास की कुछ मजेदार झलकियॉं मैं नीचे दे रहा हूँ  । इस उपन्यास को ‘वाणी प्रकाशन’ ने प्रकाशित किया है । आपके शहर के किसी भी साहित्यिक किताबों की दुकान पर यह किताब मिल जायेगी । हरिशंकर परसाई जी का पूरा साहित्य हमेशा डिमांड में रहता है इसलिये आपको ढूंढने में परेशानी नहीं होगी ।

 

नीचे दिया गया उपन्यास का अंश “गद्यकोश डाट ओ आर जी” से लिया गया है.

 

मुफतलाल की आँखों से टपटप आँसू चूने लगे। वह बोला, ‘कुमार मैं पास हो गया, इस ग्लानि से मैं मरा जा रहा हूँ। आपके फेल होते हुए मेरा पास हो जाना इतना बड़ा अपराध है कि इसके लिए मेरा सिर भी काटा जा सकता है। मैं अपना यह काला मुँह कहाँ छिपाऊँ ? यदि हम दूसरी मंजिल पर न होते, जमीन पर होते, तो मैं कहता-हे माँ पृथ्वी, तू फट जा और मैं समा जाऊँ।’

मित्र के सच्चे पश्चात्ताप से अस्तभान का मन पिघल गया। वह अपना दुख भूल गया और उसे समझाने लगा, ‘मित्र, दुखी मत होवो। होनी पर किसी का वश नहीं। तुम्हारा वश चलता तो तुम मुझे छोड़कर कभी पास न होते।’ मुफतलाल कुछ स्वस्थ हुआ। अस्तभान ने अखबारों को देखा और क्रोध से उसका मुँह लाल हो गया। उसने सब अखबारों को फाड़कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया। फिर पसीना पोंछकर बोला, ‘किसी अखबार में हमारा नाम नहीं छपा। ये अखबार वाले मेरे पीछे पड़े हैं ये मेरा नाम कभी नहीं छापेंगे। भला यह भी कोई बात है कि जिसका नाम अखबार वाले छापें, वह पास हो जाए और जिसका नाम न छापें, वह फेल हो जाए। अब तो पास होने के लिए मुझे अपना ही अखबार निकालना पड़ेगा। तुम्हें मैं उसका सम्पादक बनाऊँगा और अब तुम मेरा नाम पहले दर्जे में छापना।’

मुफतलाल ने विनम्रता से कहा, ‘सो तो ठीक है, पर मेरे छाप देने से विश्वविद्यालय कैसे मानेगा ?’ कुँअर ने कहा, ‘और इन अखबारों की बात क्यों मान लेता है ?’ मुफतलाल का हँसने का मन हुआ। पर राजकुमार की बेवकूफी पर हँसना, कानूनन जुर्म है, यह सोचकर उसने गम्भीरता से कहा, कुमार पास फेल तो विश्वविद्यालय करता है। अखबार तो इसकी सूचना मात्र छापते हैं।’

अस्तभान अब विचार में पड़ गया। हाथों की उँगलियाँ आपस में फँस गयीं और सिर लटक गया। बड़ी देर वह इस तरह बैठा रहा। फिर एकाएक उठा और निश्चय के स्वर में बोला, ‘सखा, हम आत्महत्या करेंगे। चार बार हम बी.ए. में फेल हो चुके। फेल होने के बाद आत्महत्या करना वीरों का कार्य है। हम वीर-कुल के हैं। हम क्षत्रिय हैं। हम आन पर मर मिटते हैं। हमें तो पहली बार फेल होने पर ही आत्महत्या कर लेनी थी। पर हमने विश्वविद्यालय को तीन मौके और दिये। अब बहुत हो चुका। हमें आत्महत्या कर ही लेनी चाहिए। जाओ, इसका प्रबन्ध करो।’

मुफतलाल उसके तेज को देखकर सहम गया। वह चाहता था कि अस्तभान कुछ दिन और जिन्दा रहे। उसने डिप्टी कलेक्टरी के लिए दरख्वास्त दी थी और चाहता था अस्तभान सिफारिश कर दे। वह समझाने लगा, कुमार मन को इतना छोटा मत करिये। आप ऊँचे खानदान के आदमी हैं। आपके कुल में विद्या की परंपरा नहीं है। आपके पूज्य पिता जी बारह खड़ी से मुश्किल से आगे बढ़े और आपके प्रातः स्मरणीय पितामह तो अँगूठा लगाते थे। ऐसे कुल में जन्म लेकर आप बी.ए. तक पढ़े, यह कम महत्त्व की बात नहीं है इसी बात पर आपका सार्वजनिक अभिनंदन होना चाहिए। कुमार, पढ़ना-लिखना हम छोटे आदमियों का काम है। हमें नौकरी करके पेट जो भरना है। पर आपकी तो पुश्तैनी जायदाद है। आप क्यों विद्या के चक्कर में पड़ते हैं ?’

दुविधा पैदा हो गयी थी। ऐसे मौके पर अस्तभान हमेशा मुफतलाल की सलाह माँगता था। उसे विश्वास था कि वह उसे नेक सलाह देता है। कहने लगा, ‘मित्र, मैं दुविधा में पड़ गया हूँ। तू जानता है मैं तेरी सलाह मानता हूँ। जो कपड़ा तू बताता है, वह पहनता हूँ। जो फिल्म तू सुझाता है, वही देखता हूँ। तू ही बता मैं क्या करूँ। मैं तो सोचता हूँ कि आत्महत्या कर ही लूँ।’

मुफतलाल ने कहा, ‘जी हाँ, कर लीजिए।’ अस्तभान कुछ सोचकर बोला, या अभी न करूँ ?’ मुफतलाल ने झट कहा, जी हाँ, मत करिए। मेरा भी ऐसा ही ख्याल है।’ कुँअर फिर सोचने लगा। सोचते-सोचते बोला, एक साल और रुकूँ। अगले साल कर लूँगा। क्या कहते हो ?’ मुफतलाल ने कहा, जी हाँ मैं भी सोचता हूँ कि अगले साल ही करिए। कुँअर फिर बोला, ‘पर फेल तो अगले साल भी होना है। अच्छा है, अभी आत्महत्या कर डालूँ।’ मुफतलाल ने कहा, ‘जी हाँ, जैसे तब वैसे अब। कर ही डालिए।’

कुँअर अस्तभान बहुत प्रसन्न हुआ। उसने मुफतलाल को गले से लगाकर कहा, ‘मित्र, मैं इसीलिए तो तेरी कद्र करता हूँ कि तू बिलकुल स्वतंत्र और नेक सलाह देता है। तुझ-सा सलाहकार पाकर मैं धन्य हो गया।’ मुफतलाल सकुचा गया। कहने लगा, ‘हैं हैं, यह तो कुमार की कृपा है। मैं तो बहुत छोटा आदमी हूँ। पर इतना अलबत्ता है कि जो बात आपके भले की होगी, वही कहूँगा-आपको बुरा लगे या भला। मुँह देखी बात मैं नहीं करता।’

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रिश्वत दर रिश्वत

Posted by sudadmin on June 19, 2016

राजकीय इंटर कॉलेज के एक काउंटर पर अजीबोगरीब नजारा पेश आया । कन्या विद्याधन योजना के अन्तर्गत गरीबी रेखा के नीचे गुजर बसर कर रही कन्या लाभार्थियों की तादाद बहुत कम नजर आ रही है । गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लाभार्थियों ने तहसीलों में बाबुओं और अफसरों की जेब गरम कर जो आय प्रमाणपत्र हासिल किये  थे,  स्क्रूटनी में फर्जी साबित हुआ । सिर्फ सदर तहसील में 70 प्रतिशत आय प्रमाण पत्र गलत साबित हो गये ।

एक तथाकथित गरीब काउंटर पर वजीफे की उम्मीद लिए आया तो क्लर्क ने कहा, ‘तुमने आय प्रमाण पत्र फर्जी लगाया है । तुम्हे वजीफा नहीं मिल सकता ।’

अभिभावक चौंक पड़ा, ‘आप आय प्रमाण पत्र फर्जी कैसे बता सकते हैं । उसपर मुहर लगी है । जिम्मेदार अधिकारी के दस्तखत हैं ।’

क्लर्क मुस्कुराया, ‘मुहर और दस्तखत तो दिखायी पड़ रही  है लेकिन तुमने इस सर्टिफिकेट को हासिल करने के लिये जो रिश्वत दी वह नजर नहीं आ रही है । बताओ कितने पैसे दिये हैं।’

अभिभावक का चेहरा उतर गया, ‘बताने से क्या फायदा । अगर आप वजीफा दिला सकते हैं तो मैं आपको भी धन दे सकता हूँ । अगर वजीफा नहीं मिला तो मैं यही समझूंगा कि रिश्वत की रकम चोरी हो गयी ।’

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=> का बाबू ! सर्टिफिकेटवा तो सही लग रहा है, पर एम्मैं गाँधी जी क फोटुआ नज़र नहीं आये रही है……….लाल न सही इक ठो हरे वाले ही गाँधी जी चिपकाये दो. बाकी सब कर्रेक्ट है फर्मवा में………बुझाईल ……..?

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नगर निगम के आदि देवता “वराह”

Posted by sudadmin on June 7, 2016

नगर पशुधन अधिकारी के बयान अक्सर सियासी पाले को छूते नजर आते हैं । शहर में सुअरों को बाहर करने की दिशा में उठाये गये उनके कदमों की चर्चा अखबारों में खूब होती है लेकिन सड़कों, गलियों में ये पशु स्वच्छन्दता पूर्वक विचरण करते हर मोहल्ले में देखे जा सकते हैं । उस दिन सक्सेना जी ने मार्निंग वॉक से लौकटकर सब्जी से भरा झोला बरामदे में रख दिया और लान में कुर्सी डालकर अखबार पढ़़ने लगे । वे अभी रामवृक्ष यादव के प्रकरण पर आंख गड़ाये ही थे की तभी ‘गुर्र-गुर्र’ की आवाज हुयी । एक विदेशी नस्ल का बेहद मोटा सुअर झोले मे रखी लौकी को थूथन में दाब कर भाग रहा था।

 

सक्सेना जी चीखकर सूअर की और लपके । उनकी चीख सुनकर पड़ोसी पाण्डेय जी भी दौड़े आये । सक्सेना जी गुस्से से उबल रहे थे । ‘सारे अफसर नाकारा हैं । ये शहर से सूअर नहीं हटा सकते ।’

 

पाण्डेय जी मुस्कुराये, ‘अफसरों को सुअर हटाने की जरूरत नहीं है । ये नगर निगम के ऐसे सफाई कर्मी हैं जो तनख्वाह और मंहगाई भत्ते के बिना दिन रात सफाई करते रहते हैं । ये कभी हड़ताल नहीं करते । जिस दिन शहरों से सारे सुअर बाहर कर दिये जायेंगे उस दिन बस्तियों में गंदगी का अंबार लग जायेगा ।’

सक्सेना जी पाण्डेय जी के मुख से ‘वराह’ पुराण का माहात्म सुन कर लौकी गंवाने का गम भूल गये और मुस्कुराने लगे । पाण्डेय जी ने लोहा गरम जानकर हथौड़ा चला दिया । ‘भाभी जी नहीं दिख रहीं हैं । किचन में हैं क्या ? उनसे कहियेगा की चाय में चीनी कम डालेंगी । आज कल शुगर लेवर हाई रहता है ।’

animated-pig-image-0039  animated-pig-image-0229 => छोटा परिवार सुखी परिवार का नारा इंसानों के लिए होगा. यहाँ तो  हर साल एक छोटा परिवार बढ़ जाता है……बड्कऊ को भेजा है नगर निगम की कचरा पेटी से लंच लाने. उसके आते ही आज की पार्टी शुरू हो जाएगी.                                                   

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महापुरूषों की राह पर

Posted by sudadmin on June 3, 2016

पावर कारपोरेशन और जल संस्थान का वसूली अभियान इस शहर में सरकारी दफ्तरों और संस्थानों को नंगा करने पर आमादा है । पिछले दिनों पावर कॉरपोरशन ने बड़े बकायेदारों की खबर समाचार पत्रों में प्रकाशित करवा दी तो उसमें सरकारी महकमे शीर्ष पर थे । फिर जल संस्थान ने अपने बड़े बकायेदारों का खुलासा किया तो उसमें मंडी परिषद, पीडल्यूडी से लगाकर कलक्टर और सीडीओ तक बकाया बिल न देने वालों की लिस्ट में नजर आये ।

 

जल संस्थान का एक कमर्चारी जानकीपुरम के एक बकायेदार के घर गया । उसने बकायेदार को धमकाते हुए कहा, ‘अगर 15 दिनों में बकाया 25 हजार रूपया जमा नहीं किया तो आपके खिलाफ आर सी जारी करके कलक्टर साहब के दफ्तर भेज दी जायेगी ।’

 

बकायेदार छूटते ही बोला, ‘भेज दो हमारे खिलाफ आर सी, लेकिन कलक्टर साहब के खिलाफ आरसी भी इसके साथ ही भेज देना । उनसे तीन लाख छप्पन हजारका बकाया वसूल कर लो, तब हमारे पास आना । हम तो कलक्टर साहब के दिखाये रास्ते पर चल रहे हैं ।’

=> आपकी  ५० हज़ार की आर सी  कटी है. बिजली का बिल आपने ३ साल से नहीं भरा है.

animated-aggression-and-anger-image-0059 animated-dancing-image-0235  => नंगा क्या नहायेगा  और क्या निचोडेगा. पान की दुकान का कहीं ५० हज़ार का बिल आता है. वो भी तब, जब मैं कटिया  मार कर बिजली जलाता हूँ .जाओ  कोर्ट में वसूल कर लेना.

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